Tuesday, January 9, 2018

लोकतंत्र में पलीता लगाती पुलिसिया कवायद!

एक बार बजरिया थाने के बाहर सफाई कर्मी कूडा बटोर के आग लगा गया। प्लास्टिक का खतरनाक धुआँ देख के मैँ थाने गया। जाकर बोला तो बहस हो गयी। फिर मैने समझाया कि भैया आप लोग भी इँसान हो धुआँ तो सबके लिए खतरनाक है। जवाब मेँ जब मोहर्रिर कहने लगा कि हमेँ कानून नहीँ पता। तब पूरे थाने का समझदारी का पता लगा। सोचिए कि मना करने के लिए कानून की जानकारी चाहिए कि कामन सेँस? लेकिन मामला महज कॉमन सेन्स का ही नहीं, जहाँ की पुलिस वहां का दबाव भी ऐसी घटनाओं की वजह हो सकता है जिससे व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़े होने लाजिमी हैं| 
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सोशल मीडिया पर नितिन त्रिपाठी इस घटना को विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि इस केस में सीओ ने पार्टी कार्यालय के बाहर खड़ी गाड़ी पर लट्ठ चलाये| जब कार्यालय के अन्दर से आदित्यनाथ द्विवेदी जी निकले तो बहस में उन्हें वहीं झापड़ भी धर दिए| फिर उन्हें कार्यालय से ही उठा कर पुलिस ले गई| घंटों बाद स्वाति सिंह जी के फोन के पश्चात रिहा किया गया|. साथ ही नितिन मानते हैं कि  ऐसी घटनाएं तो कॉमन हैं| कार्यकर्ताओं को भी समझदारी का परिचय देना चाहिए और लाइन ड्रा कर लेनी चाहिए कि इससे ज्यादा नहीं| बहुत ज्यादा होगा सीओ को लाइन हाजिर कर ट्रान्सफर कर दिया जाएगा|  इस घटना पर ये कहते हुए कि भैया हम लोग अब इस विषय पर कुछ ना ही कहें तो अच्छा है। अपनी ही बुराई होगी, अधिवक्ता आरुष त्रिपाठी चुप रहने में भलाई का सबक देते हैं| वरिष्ठ भाजपा नेता मोहित पाण्डेय मानते हैं कि सोशल मीडिया पर चर्चा होनी चाहिए| इसमें हमारी बुराई नहीं उप्र पुलिस को सीख देने का उद्देश्य है। हमारा कार्यकर्ता तो अनुशासित है। पुलिस को किसी को भी पीटने का अधिकार नहीं है। यही पुलिस सपा सरकार में सैंकड़ों बार पिटी है। पार्टी के नीरज पाण्डेय की मानें तो संस्कारित लोगों के साथ ऐसा ही होता है...जिला विस्तारक जो कि अपना घर परिवार छोड़कर संगठन को मजबूत करने मे दिन रात लगा रहता है...उसको भी नही बक्शा...
वहाँ के पुलिस अधीक्षक को ऐसे उद्दण्ड पुलिस कर्मियों पर तुरन्त कार्यवाही करनी चाहिए...| पार्टी के ही दूसरे चर्चित चेहरे और स्वच्छता अभियान के ब्राण्ड एम्बेसडर अरुण कुमार मिश्र मानते हैं कि वाह बंसल जी का सिपाही ही पिट गया साथ ही कहते हैं वैरी गुड| उन्हें भी उम्मीद है कि अब शायद कुछ कार्यवाही हो जाये| हालाँकि किसी भी तरह की हिंसा में कोई वैरी गुड वाली बात नहीं, लेकिन अरुण कुमार मिश्र की कथनी में तंज कम खेमेबंदी का सिजरा उनके दूसरे बयान से साफ़ हो जाता है,जब वो मोहित पाण्डेय स कहते हैं कि भाई साहब सीरियस ही है लेकिन भाजपा नेतृत्व के कान पर जूँ नही रेंग रही | कार्यकर्ता उत्पीड़न चरम पर है अब शायद कुछ अच्छा हो जाये| पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर अवधेश सिंह गौर भी आहत हैं,  अवधेश के मुताबिक कार्यकर्ताओ से लगातार बदसलूकी हो रही है, संगठन को सोचना होगा क्योंकि जब कोई हमारे पास आता है समस्या लेकर हमे पीडित की मद्दत में आगे जाना होता है कानपुर में भी ऐसा कई बार देखने को मिला| इसी बात में एक नजीर जोड़ते हुए मोहित पाण्डेय बताते हैं कि ऐसी ही एक घटना में क्षेत्रीय उपाध्यक्ष आनंद राजपाल को बिना बात के ही पीट दिया था|  जाहिर है कि भाजपा ही नहीं सभी वर्गों से ऐसी घटनाओं की एक सुर में निंदा हो रही है|   प्रतापगढ़ की ये खबर इतनी नजीर के लिए तो काफी है कि भाजपा की
सरकार होने के बावजूद भी पुलिस के रवैया में सुधार होना बाकी है| पारस अवस्थी कहते हैं कि ऐसे मामलों के लिए एक एडवाइजरी जारी करनी चाहिए कि यदि किसी कार्यकर्ता के साथ किसी भी तरह की बदसलूकी हुई तो सीधा पुलिस कप्तान पर कार्यवाही की जाएगी तब तो ये सुधरेंगे अन्यथा सबको पता है कि दोषी पुलिस वाले को सस्पेंड कर देंगे खानापूर्ति के लिए फिर मामला ठंडा होने पर उसकी बहाली हो जाएगी , किन्तु एक थप्पड़ और गाली का अपमान एक अनुशासित कार्यकर्ता के दिमाग मे हमेशा बना रहेगा , ये कहने में मुझे कत्तई परहेज नही कि संगठन की नींव कार्यकर्ताओं के द्वारा डाली गई है उसको वटवृक्ष कार्यकर्ताओं ने ही किया है तो जो हमारा जनक है जिसके दम पर हम विश्व को ललकारते हैं ऐसे कार्यकर्ता के अपमान का मतलब उसने सरकार का अपमान किया। बकौल पारस कार्यकर्ताओं ने माननीय उप-मुख्यमंत्री जी तक प्रशासन द्वारा कार्यकर्ताओं के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत की| यदि ऐसा ही रसूख होता, कार्यकर्ता अनुशासनहीन होता तो उप-मुख्यमंत्री जी से शिकायत करने की बजाय खुद निपट लेते, चाहे रामलला का मुद्दा हो या हाल में भाजपा के वरिष्ठ नेता को अपमानित करने का| कार्यकर्ताओं ने संयम का पूरा परिचय दिया है।
अजय तिवारी एक अहम सवाल उठाकर पूछते हैं कि पुलिस का मुद्दा क्यों बना? बताइये साहब10 महीनो में कितने नेताओ को पुलिस घसीट के ले गई? अजय तिवारी प्रतापगढ़ के इस मामले को अपवाद मानते हैं, जिसको तूल नहीं दिया जाना चाहिए| इतना ही नहीं अजय भाजपा की सोशल मीडिया टीम को चुनौती दे डालते हैं कि पुलिस को जब भाजपा नेता मरता है वो भी पोस्ट डाला करिये भईया, ताकि आला कमान को दिखे तो!
अशुतोष दीक्षित कार्यवाही मी मांग करते हैं तो सौरभ द्विवेदी तंज कसते हैं कि भाजपा वाले मंदिर का घण्टा है कोई भी आके बजा के चला जाता है यही उत्तर प्रदेश पुलिस जब सपाइयों से लात खाती थी तब सुधरी रहती थी अभी लखनऊ में एक भाजपा पार्षद को नवे नवे दरोगा बने लौंडो ने कॉलर पकड़ के धर लिया था जबकि उसने सिर्फ एक बाइक वाले कि मदद के उद्देश्य से सिर्फ बातचीत करना चाह रहा था गोमती नगर 1090 चौराहे वाकई घटना है|.  
इस तरह की घटनाएँ सत्ता पक्ष या विपक्ष की बयानी भर नहीं| यदि पुलिस किसी के साथ हिंसा करती है तो वह कानूनी हिंसा जैसा नजारा होता है| जिसे सरकार को तत्काल प्रभाव से बंद करवाना चाहिए| लेकिन मालूम होता है कि मंत्री जी की सख्त हिदायत से कोई असर नहीँ। भले ही पार्टी के वरिष्ठ नेता ये मानें कि अधिकारियों कर्मचारियों को साम्प्रदायिक, जातिवादी और भ्रष्टाचारी सरकारों की आदत है, ये आदत जाते जाते जाएगी।  

कूड़े के जलने पर हम लोग हल्ला मचाते रहे, लिखते रहे, जब अधिकारी लोग अख़बार पढ़े तो होश आया कि दमे से कैंसर तक तमाम मर्ज प्लास्टिक के धुएं से होते हैं| उत्तर प्रदेश में पुलिस सुधार एक प्रमुख एजेण्डा है, तमाम विद्वानों का काम है कि इस व्यवस्था को चाक चौबंद करने में सरकार की मदद करें| भाजपा की पार्टी लाइन में भारतीय ख़ुफ़िया और भारतीय पुलिस सेवा के तमाम रिटायर्ड अधिकारी पोलिटिकल हनीमून मना रहे हैं| हमारे सुधी सुविज्ञ नेताओं के लिए ये कहना शायद थोडा मुश्किल हो कि बाबू साहेब लोग थोड़ी दिमागी कसरत भी करें, कुछ पसीना बहायें| स्थानीय स्तर पर भी आम लोगों के जुड़ने के लिए व्यवस्था में तमाम प्रावधान हैं, एक प्रावधान पुलिस के लिए पीस कमेटी है भी है और ट्रेनिंग का भी| सब के लिए बजट है और कानून भी| लेकिन पिछले कई सालों से सिर्फ ठेकेदारी में लगे लोग खा कमा रहे हैं, वही सबकी हिस्सेदारी का भी सम्मान कर रहे हैं| यूपी100 बना कितने की ठेकेदारी हुई? कितनी गाड़ियाँ और उपकरण आये? आधुनिकीकरण के नाम पर किसकी किसकी मौज बनी किसका बेडापार हुआ ये सब तमाम लोग जानते हैं| कितने उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है? लेकिन हजारों करोड़ पुलिस व्यवस्था सुधार में खर्च तो हुए ही| सच तो ये भी है कि थानों में सालों से कूड़ा जमा है, गन्दगी, गलिचियत भी है, मचछर भी हैं, डेंगू मलेरिया भी, लेकिन सफाई की किसे फ़िक्र है| थाने में रहने वाले अपनी रिहाइश को लेकर संजीदा नहीं, ऐसे में सिर्फ कानून और डंडे के नकली भय का माहौल कितने दिन चल पायेगा| कानून बेहतरी के लिए होते हैं, लेकिन   थाने के बाहर कितने सालों से गाड़ियाँ खड़ी हैं? अब तो लोग उन्ही के इर्द गिर्द पेशाब भी करने लगे हैं| ये सब देख के मालूम होता है कि हमारे रक्षक खुद ही अफीम चाटे बैठे हैं| आला अधिकारी ट्विटर--ट्विटर खेल रहे हैं, उस पर भी न तो हर एक की देखते हैं और न ही सुनते हैं| ये पुलिस की मोबाइल क्रांति है| जरा बताएं तो कि ऐसे में पब्लिक कौन सी क्रांति कर डालेगी? 
हमारी व्यवस्था का एक कडवा सच तो यही है कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र में तमाम मत मतान्तर के बावजूद कुर्सी ही आजाद हिंदुस्तान के कानून की माँ साबित हुई है| प्रैक्टिकल राजनीति वह राजनीति है जिससे आप कुर्सी पे काबिज रह सकें| कारोबार और राजनीति में सिद्धांत और व्यवहार दोनों के दो अलग अलग अलग रास्ते हो जाते हैं तो कथनी करनी में फर्क तय है| पुलिस और राजनेता दोनों के लिए अपनी अपनी नजीर बनाने की जरुरत है|